12 वर्षों में एक बार आयोजित होने वाली उत्तराखंड की प्रसिद्ध और विश्व की सबसे लंबी (लगभग 280 किलोमीटर) पैदल यात्रा—मां नंदा देवी बड़ी जात यात्रा—शनिवार, 5 सितंबर से आधिकारिक रूप से शुरू हो गई है। सिद्धपीठ कुरुड़ में पांच दिवसीय विशेष पूजा-अर्चना और धार्मिक अनुष्ठानों के बाद मां नंदा की डोली को श्रद्धालुओं की नम आंखों और ‘जय मां नंदा’ के उद्घोष के बीच कैलाश के लिए विदा किया गया।
इस बार कुरुड़ मंदिर समिति द्वारा आयोजित यह ऐतिहासिक यात्रा 30 सितंबर को होमकुंड में मुख्य धार्मिक अनुष्ठान के साथ संपन्न होगी।
यात्रा का निर्धारित रूट और प्रमुख पड़ाव:
- 5 सितंबर: सिद्धपीठ कुरुड़ से तीनों डोलियों का कैलाश के लिए प्रस्थान।
- 12 सितंबर: रामणी पड़ाव पर पहुंचेगी यात्रा, जहाँ विभिन्न देव डोलियों और छंतोलियों का भव्य मिलन होगा।
- 15 सितंबर: आला, सितेल और कनोंल होते हुए वाण स्थित प्रसिद्ध लाटू मंदिर में रात्रि प्रवास।
- 18 सितंबर: गैरोली पाताल होते हुए वेदनी बुग्याल में प्रवेश, जहाँ सप्तमी की विशेष पूजा संपन्न होगी।
- 19 सितंबर: बगुवावासा, पातरनचौणियां, कैलवा विनायक, रूपकुंड और ज्यूंरागली पार कर शिलासमुद्र आगमन।
- 30 सितंबर (समापन): दुर्गम होमकुंड में विधि-विधान से अंतिम पूजा-अर्चना के साथ बड़ी जात यात्रा का औपचारिक समापन।
खास बातें और व्यवस्थाएं:
- होमकुंड तक का सफर: सामान्य लोकजात यात्रा वेदनी कुंड तक ही जाती है, लेकिन 12 साल में आयोजित होने वाली इस ‘बड़ी जात’ में डोली को सीधे होमकुंड तक ले जाया जाता है।
- श्रद्धालुओं का उत्साह: इस हिमालयी महाकुंभ में भाग लेने के लिए राज्य ही नहीं, बल्कि देश-विदेश से हजारों श्रद्धालु चमोली पहुंच रहे हैं।
- बधाण क्षेत्र की डोली पर संशय: बड़ी जात मंदिर समिति के अध्यक्ष कर्नल हरेंद्र सिंह रावत ने बताया कि बधाण क्षेत्र की नंदा डोली के इस यात्रा में शामिल न होने को लेकर कुछ विरोधाभासी बातें सामने आई हैं, जिस पर स्थिति स्पष्ट करने के लिए चमोली जिलाधिकारी से वार्ता की जा रही है।
परंपरा और आस्था के इस अनोखे संगम से संपूर्ण ध्याणी (बेटियों) का मायका और हिमालयी क्षेत्र भक्तिमय हो उठा है।
