- 97 जिलाध्यक्षों में करीब 70% यादव-मुस्लिम, दलित और सवर्णों की भागीदारी बेहद कम; 2027 चुनाव से पहले संगठन पर उठे सवाल
- सपा के 95 जिलाध्यक्षों में 66 यादव-मुस्लिम, जबकि दलित सिर्फ 3 और सवर्ण 7 ही
- PDA का नारा देने वाली सपा में एक भी ठाकुर जिलाध्यक्ष नहीं, संगठन में M-Y समीकरण का दबदबा
- 2027 चुनाव से पहले संगठन में बड़े फेरबदल की चर्चा, गैर-यादव ओबीसी और अन्य जातियों को साधने की चुनौती
मनोज शुक्ल, वीकली आई न्यूज़
लखनऊ। समाजवादी पार्टी ने पिछले कुछ वर्षों में पीडीए (पिछड़ा-दलित-अल्पसंख्यक) का नारा देकर उत्तर प्रदेश की राजनीति में नई रणनीति पेश की। 2024 लोकसभा चुनाव में इस फॉर्मूले के सहारे पार्टी को बड़ी सफलता मिली और 80 में से 37 सीटें जीतने में कामयाब रही। लेकिन संगठन के भीतर की तस्वीर कुछ और ही कहानी बयां करती है।
प्रदेश में सपा के 95 जिलाध्यक्षों और महानगर अध्यक्षों में से करीब 70 प्रतिशत पद यादव और मुस्लिम नेताओं के पास हैं। इनमें 42 यादव और 24 मुस्लिम जिलाध्यक्ष हैं, जबकि दलितों को महज 3 और सामान्य वर्ग को 7 जिलों की जिम्मेदारी दी गई है। हैरानी की बात यह है कि संगठन में एक भी ठाकुर जिलाध्यक्ष नहीं है।
पीडीए का नारा, लेकिन संगठन में पुराना ही समीकरण है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि सपा का आधार लंबे समय से यादव-मुस्लिम (M-Y) समीकरण रहा है। यही वजह है कि पार्टी नेतृत्व संगठन में भी इसी पर भरोसा करता नजर आता है।
हालांकि प्रदेश में ओबीसी की आबादी लगभग 40 प्रतिशत, दलितों की 20 प्रतिशत और सवर्णों की करीब 19 प्रतिशत मानी जाती है, लेकिन संगठन में इन वर्गों की हिस्सेदारी सीमित है। पूर्वांचल के कई मंडलों में यादव नेतृत्व का वर्चस्व है, जबकि पश्चिमी यूपी में मुस्लिम जिलाध्यक्षों की संख्या ज्यादा है। हालांकि आगरा और कानपुर मंडल अपेक्षाकृत संतुलित माने जा रहे हैं, जहां अलग-अलग जातियों को प्रतिनिधित्व दिया गया है।
प्रदेश में कुल 97 पदों में से बिजनौर और रामपुर नगर के जिलाध्यक्ष पद अभी खाली हैं। पिछला बड़ा संगठनात्मक फेरबदल 7 अप्रैल 2023 को हुआ था, जब प्रदेश अध्यक्ष की कमान नरेश उत्तम पटेल के हाथों में थी। बाद में उन्हें लोकसभा चुनाव लड़ाने के बाद पार्टी ने श्यामलाल पाल को प्रदेश अध्यक्ष बनाया, लेकिन उनके कार्यकाल में बड़े स्तर पर बदलाव अभी तक नहीं हो पाए हैं।
विपक्ष का तंज
भाजपा प्रवक्ता राकेश त्रिपाठी का कहना है कि सपा का PDA मॉडल सिर्फ चुनावी नारा है।
उनके मुताबिक, “सपा संगठन में परिवार और M-Y समीकरण से आगे बढ़ने को तैयार नहीं है।”
जवाब में सपा प्रवक्ता उदयवीर सिंह ने इन आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि जिलाध्यक्ष स्थानीय कार्यकर्ताओं की राय से चुने जाते हैं। उनका कहना है कि प्रदेश कमेटी में सभी वर्गों को प्रतिनिधित्व देने की कोशिश की जाती है।
2027 से पहले बदलेगा समीकरण?
जानकारों का मानना है कि सपा का पारंपरिक आधार यादव-मुस्लिम रहा है, इसलिए संगठन में उसका प्रभाव दिखना स्वाभाविक है। लेकिन 2027 विधानसभा चुनाव में पार्टी को गैर-यादव ओबीसी और अन्य जातियों को साथ जोड़ने की चुनौती भी होगी।
ऐसे में बड़ा सवाल यही है कि क्या सपा PDA को संगठन में भी लागू करेगी या फिर राजनीति का केंद्र एम वाई समीकरण ही बना रहेगा?
